Q-1. एक वाक्य में उत्तर दीजिए :
1. मृग कस्तूरी को कहाँ ढूँढ़ता है?
=> मृग कस्तूरी को वन में इधर - उधर ढूँढता है ।
2. हमारा जन्म कृतार्थ करने के लिए किसकी सेवा करनी चाहिए?
=> हमारा जन्म कृतार्थ करने के लिए हमें संतो की सेवा करनी चाहिए ।
3. भवसागर तरने के लिए कौन-कौन से पाँच तत्व हैं?
=> साधु का मिलना, हरिभजन, दया की भावना, नम्रता और परोपकार यह पाँच तत्व है ।
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Q-2. निम्नलिखित भावार्थ वाले दोहे ढूंढकर उनका गान कीजिए :
1. परमात्मा घट-घट में व्याप्त है, फिर भी हम देख नहीं पाते हैं।
=> कस्तूरी कुंडली बेस, मृग ढूँढे वन माहिं ।
ऐसे घट - घट राम है, दुनिया देखें नाहिं ।।
2. हमें जो कुछ मिला हैं, वह ईश्वर का ही है और वह ईश्वर को सौंपने से अपना कुछ नहीं रहता है।
=> मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ हय सो तेरा ।
तेरा तुझको सौंपते, क्या लगेगा मेरा ।।
3. अप्रामाणिक रूप से संपत्ति इकट्ठी करके उसमें से दान करने पर स्वर्गप्राप्ति नहीं हो सकती है।
=> एहरन की चोरी करे, करे सुई का दान ।
ऊँचे चढ़कर देखते, कौतिक दूर विमान ।।
4. दूसरों की संपत्ति देखकर दुःखी होने के बजाय ईश्वर ने हमें जो कुछ दिया है उसमें संतोष रखना चाहिए।
=> रुखा - सूखा खाई कै, ठंडा पानी पीव ।
देखि पराई चुपड़ी, मत ललचावै जिव ।।
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Q-3. निम्नलिखित दोहों का भावार्थ स्पष्ट कीजिए :
1. संत मिले सुख उपजे, दुष्ट मिले दुःख होय। सेवा किजे संत की, तो जनम् कृतार्थ सोय ॥
=> संत के मिलने पर सुख का अनुभव होता है और दुष्ट मुलने पर मन दुःखी हो जाता है । इसीलिए संत की सेवा कीजिए । उससे तुम्हारा जन्म सफल होगा । यहाँ कबीरजी ने संत और दुष्ट का अंतर बताते हुए संत - सेवा की महिमा बताई है ।
2. सोना सज्जन साधु जन, टूटि जुरै सौ बार। दुर्जन कुंभ कुम्हार के, एकै धका दरार ॥
=> सोना सज्जन और साधु रूठने पर भी बार - बार जुड़ते रहते है । सज्जन अच्छे लोगों से संबंध बनाकर रखते है । जबकि दुर्जन लोगो जरा - सी दरारवाले मटके को थोड़ा धक्का मारने पर फुट जाता है । इसी तरह दुर्जन व्यक्ति टूटे हुए संबंध को तोड़ देने में संकोच नहीं करते । यहाँ कबीरजी ने सज्जन और दुर्जन के स्वभाव का अंतर बताय है ।
3. काँकर पाथर जोरि कै, मसजिद लईं चुनाय। ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय ॥
=> कंकड़ - पत्थर मस्जिद बनाई और उस पर चढ़कर मुल्ला बाँग देने लगा । कबीर कहते है की खुदा क्या बहरा हो गया है जो उसे जोर से पुकारने की जरुरत पड़ती है । कबीरजी कहते है की भगवान हृदय में है उसका स्मरण मन में करना चाहिए । आडंबर से दूर रहना चाहिए ।
4. दुःख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, तो दु:ख काहे को होय॥
दुःख में सब लोग भगवान को याद करते है । सुख में उसे कोई याद नहीं करता । यदि सुख में भगवान को याद किया जाए तो दुःख आए ही क्यों? कबीरजी कहते है की चाहे दुःख हो या सुख भगवान का स्मरण हमेशा (नित्य) करना चाहिए ।
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